मूर्ति पूजा में बसी है सकारात्मकता
सकारात्मकता और एनर्जी लेवल बढ़ाने का सबसे बड़ा उपाय- मूर्ति पूजा
नमस्कार मित्रों,
अपने ब्लॉग पर आज मेरी यह पहली पोस्ट है। बहुत दिनों से इच्छा थी कि अपने मन की बातें आप सबके साथ करूं। बातें वह, जो आपके और हमारे अंदर की हैं। जिन्हें करने की इच्छा सबकी होती है, लेकिन उतने बड़े दायरे नहीं मिल पाते। बातें वह, जो हमारे कई प्रश्नों के उत्तर भी देती हैं, लेकिन तब, जब हम आपस में बात करें। तो शुरुआत मेरे एक प्रिय विषय से-मूर्ति पूजा। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो मुझ जैसे करोड़ों लोगों के जीवन और ऊर्जा का आधार है। जो हमें भगवान के होने की स्पष्ट अनुभूति कराती है। इससे जो विश्वास मन में जागता है, वह हमें सकारात्मकता से भर देता है। सुबह से रात तक हम सभी अपने-अपने जीवन में बहुत सारी अनचाही और अप्रिय स्थितियों के बीच से निकलते हैं। जो कई बार हमारे जीवन पर स्थाई प्रभाव भी छोड़ती हैं। हम जब छोटे बच्चे होते हैं, तब जितना ऊर्जा से भरा निर्दोष और आनंद दाई जीवन हमारे पास होता है, क्या उसी जीवन को जीने का अधिकार हमें नहीं होना चाहिए? जरूर होना चाहिए, लेकिन जीवन की कठिनाइयों के बीच अपनी उस उर्जा को बचाए रखने का पूरा-पूरा सहारा हमें भगवान के स्वरूप की प्रतीक मूर्ति पूजा से ही मिलता है। हम जिसे पूरे जीवन तलाशते हैं, आखिर उसका एक निश्चित स्वरूप हमारे लक्ष्य में होना तो चाहिए ना? उस निश्चित स्वरूप को हमारे ऋषि-मुनि सदियों पहले हमारे सामने रख गए हैं, लेकिन हम अब भी ईश्वर के उस स्वरूप को ढूंढ रहे हैं लेकिन मानने को तैयार नहीं कि उसका कोई रूप भी होता है। जब वह अनदेखा, अंजाना स्वरूप नहीं मिलता तो निराशा होनी स्वाभाविक है। इसलिए उस निराशा को आशा में बदलने के लिए देव प्रतिमाओं में भगवान के दर्शन के भाव को एक बार स्वीकार कर देखिए। जो आनंद और विश्वास आएगा वो शब्दों से परे होगा। अपने जीवन के सबसे ज्यादा प्रिय लोगों पर एक नजर डालकर देखिए, उन सभी का एक व्यक्तित्व है। आप उसी व्यक्तित्व को चाहते हैं उसका संबंध करते हैं और उसे जानते भी हैं तो फिर हमारे सबसे प्रिय हमारे ईश्वर को हम खुद से अंजाना क्यों रखें। प्रेम से प्रतिमाओं में उनकी अनुभूति कीजिए और उनकी कृपा लीजिए। वह एक ही है और वही एक अलग-अलग रूप में है। बस, हमें अपने उस इष्ट स्वरूप को पहचानने की जरूरत है।
राम- राम। अगली बार नए विषय के साथ फिर मिलेंगे।